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मुख्य कॉन्टेंट

प्रकाश-विद्युत (Photoelectric) प्रभाव

प्रकाश-विद्युत प्रभाव के प्रयोगों को समझें। कैसे इन प्रयोगों से यह विचार आया कि प्रकाश ऊर्जा के एक कण के रूप में व्यवहार करता है जिसे फोटॉन कहा जाता है।

मुख्य बिन्दु

  • प्रकाश के तरंग मॉडल के आधार पर, भौतिकविदों ने अनुमान लगाया कि प्रकाश का आयाम (amplitude) बढ़ने से उत्सर्जित प्रकाशिक इलेक्ट्रॉनों (photoelectrons) की गतिज ऊर्जा में वृद्धि होगी, जबकि आवृत्ति बढ़ने से मापी गई धारा में वृद्धि होगी।
  • अनुमान के विपरीत, प्रयोगों से पता चला कि प्रकाश की आवृत्ति बढ़ने से प्रकाशिक इलेक्ट्रॉनों की गतिज ऊर्जा में वृद्धि हुई, और प्रकाश का आयाम बढ़ने से धारा में वृद्धि हुई।
  • इन निष्कर्षों के आधार पर, आइंस्टीन ने प्रस्तावित किया कि प्रकाश E=hν की ऊर्जा वाले फोटॉन नामक कणों की एक धारा की तरह व्यवहार करता है।
  • कार्य-फलन, Φ, धातु की सतह से इलेक्ट्रॉनों के उत्सर्जन को प्रेरित करने के लिए आवश्यक ऊर्जा की न्यूनतम मात्रा है, और Φ का मान धातु पर निर्भर करता है।
  • आपतित फोटॉन की ऊर्जा, धातु के कार्य फलन और प्रकाशिक इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा के योग के बराबर होनी चाहिए: Eफ़ोटॉन=KE इलेक्ट्रॉन+Φ

परिचय: प्रकाश-विद्युत प्रभाव क्या है?

जब प्रकाश किसी धातु पर पड़ता है, तो धातु की सतह से इलेक्ट्रॉन बाहर निकल सकते हैं, जिसे प्रकाश-विद्युत प्रभाव के रूप में जाना जाता है। इस प्रक्रिया को अक्सर प्रकाशिक उत्सर्जन (photoemission) के रूप में भी जाना जाता है, और जो इलेक्ट्रॉन धातु से बाहर निकलते हैं, वे हैं प्रकाशिक इलेक्ट्रॉन कहलाते हैं। व्यवहार और उनके गुणों के संदर्भ में, प्रकाशिक इलेक्ट्रॉन अन्य इलेक्ट्रॉनों से अलग नहीं हैं। उपसर्ग, प्रकाशिक (photo)-, हमें बास यही बताता है कि इलेक्ट्रॉनों को आपतित प्रकाश द्वारा धातु की सतह से बाहर निकाल दिया गया है।
प्रकाश-विद्युत प्रभाव में, धातु की सतह से टकराने वाली प्रकाश तरंगें (लाल लहरदार रेखाएं) धातु से इलेक्ट्रॉनों को बाहर निकालने का कारण बनती हैं। चित्र विकिमीडिया कॉमन्स से, [CC BY-SA 3.0](https://creativecommons.org/licenses/by-sa/3.0/ deed.en).
इस लेख में, हम चर्चा करेंगे कि कैसे 19वीं सदी के भौतिकविदों ने चिरसम्मत (Classical) भौतिकी का उपयोग करके प्रकाश-विद्युत प्रभाव को समझाने का प्रयास किया (लेकिन असफल रहे!)। इससे अंततः विद्युत चुम्बकीय विकिरण की आधुनिक व्याख्या का विकास हुआ, जिसमें तरंग-जैसे और कण-जैसे दोनों गुण हैं।

प्रकाश के तरंग रूप पर आधारित प्रागुक्तियाँ (predictions)।

प्रकाश-विद्युत प्रभाव को समझाने के लिए, 19वीं सदी के भौतिकविदों ने सिद्धांत दिया कि आने वाली प्रकाश तरंग का दोलित विद्युत क्षेत्र इलेक्ट्रॉनों को ऊष्मा दे रहा था, जिसकी वजह से उनमें कंपन हो रहा था और अंततः वे धातु की सतह से मुक्त हो जा रहे थे। यह परिकल्पना इस धारणा पर आधारित थी कि अंतरिक्ष के माध्यम से प्रकाश पूरी तरह से एक तरंग के रूप में यात्रा करता है (प्रकाश के मूल गुणों के बारे में अधिक जानकारी के लिए यह लेख देखें)। यह भी माना गया कि प्रकाश तरंग की ऊर्जा उसकी चमक (brightness) के समानुपाती होती है, जो तरंग के आयाम (amplitude)से संबंधित होती है। अपनी परिकल्पनाओं का परीक्षण करने के लिए, उन्होंने इलेक्ट्रॉन उत्सर्जन की दर के साथ-साथ प्रकाशिक इलेक्ट्रॉनों की गतिज ऊर्जा पर प्रकाश केआयाम और आवृत्ति के प्रभाव को देखने के लिए प्रयोग किए।
तरंग के रूप में प्रकाश के चिरसम्मत वर्णन (classical description) के आधार पर, उन्होंने निम्नलिखित प्रागुक्तियाँ कीं:
  • उत्सर्जित प्रकाश इलेक्ट्रॉनों की गतिज ऊर्जा प्रकाश के आयाम के साथ बढ़नी चाहिए।
  • इलेक्ट्रॉन उत्सर्जन की दर, जो मापी गई विद्युत धारा के समानुपाती होती है, प्रकाश की आवृत्ति बढ़ने पर बढ़नी चाहिए।
उन्होंने ये भविष्यवाणियाँ क्यों कीं, यह समझने के लिए हम एक प्रकाश तरंग की तुलना पानी की तरंग से कर सकते हैं। कल्पना कीजिए कि कुछ गेंदें एक ऐसे जहाजघाट (dock) पर रखी हैं जो समुद्र तक फैला हुई है। जहाजघाट एक धातु की सतह का प्रतिनिधित्व करता है, गेंदें इलेक्ट्रॉनों का प्रतिनिधित्व करती हैं, और समुद्र की लहरें प्रकाश तरंगों का प्रतिनिधित्व करती हैं।
यदि एक बड़ी लहर जहाजघाट को हिला देती है, तो हम अनुमान लगाएंगे कि बड़ी लहर की ऊर्जा, एक छोटी लहर की तुलना में बहुत अधिक गतिज ऊर्जा के साथ गेंदों को जहाजघाट से उछाल देगी। भौतिकविदों का मानना था कि यदि प्रकाश की तीव्रता बढ़ा दी जाए तो ऐसा ही होगा। प्रकाश के आयाम के प्रकाश ऊर्जा के समानुपाती होने की उम्मीद की जा रही थी, इसलिए उच्च आयाम वाले प्रकाश के परिणामस्वरूप अधिक गतिज ऊर्जा वाले प्रकाशिक इलेक्ट्रॉन निकलने की प्रागुक्ति की गई थी।
चिरसम्मत भौतिकविदों ने यह भी प्रागुक्ति (prediction) की कि प्रकाश तरंगों की आवृत्ति (स्थिर आयाम पर) बढ़ने से इलेक्ट्रॉनों के उत्सर्जन की दर में वृद्धि होगी, और इस प्रकार मापे गए विद्युत प्रवाह में भी वृद्धि होगी। इसे हम अपने गेंद के उदाहरण का प्रयोग करते हुए समझें तो हम उम्मीद करेंगे कि जहाजघाट से अधिक बार टकराने वाली लहरें, जहाजघाट से कम बार टकराने वाली लहरों की तुलना में अधिक गेंदों को जहाजघाट से गिराएंगी।
अब जब हम जानते हैं कि भौतिकविदों ने क्या सोचा था कि क्या होगा, आइए अब देखें कि उन्होंने प्रयोगात्मक रूप से वास्तव में क्या देखा!

जब अंतर्ज्ञान (Intuition) हुआ विफल: बचाने के लिए आए फ़ोटॉन!

जब प्रकाश के आयाम और आवृत्ति के प्रभाव को देखने के लिए प्रयोग किए गए, तो निम्नलिखित परिणाम देखे गए:
  • प्रकाशिक इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा प्रकाश की आवृत्ति के साथ बढ़ती है।
  • प्रकाश की आवृत्ति बढ़ने पर विद्युत धारा स्थिर रहती है।
  • विद्युत धारा प्रकाश के आयाम के साथ बढ़ती है।
  • प्रकाश का आयाम बढ़ने पर प्रकाशिक इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा स्थिर रहती है।
ये परिणाम तरंग के रूप में प्रकाश के चरसम्मित (classical) वर्णन पर आधारित प्रागुक्तियों से पूरी तरह भिन्न थे! जो हो रहा था उसे समझाने के लिए प्रकाश के एक बिल्कुल नए मॉडल की आवश्यकता थी। और यह नया मॉडल अल्बर्ट आइंस्टीन ने विकसित किया गया, जिन्होंने प्रस्तावित किया कि प्रकाश कभी-कभी विद्युतचुम्बकीय ऊर्जा के कणों की तरह व्यवहार करता है जिसे अब हम फोटॉन कहते हैं। फोटॉन की ऊर्जा की गणना प्लैंक के समीकरण का उपयोग करके की जा सकती है:
Eफ़ोटॉन=hν
जहां Eफ़ोटॉन जूल (J) में एक फोटॉन की ऊर्जा है, h प्लैंक का स्थिरांक है (6.626×1034 Js), और ν Hz में प्रकाश की आवृत्ति है। प्लैंक के समीकरण के अनुसार, एक फोटॉन की ऊर्जा प्रकाश की आवृत्ति, ν के समानुपाती होती है। तत्पश्चात प्रकाश का आयाम किसी दी गई आवृत्ति वाले फोटॉनों की संख्या के समानुपाती होता है।
संकल्पना की जांच: जैसे-जैसे फोटॉन की तरंगदैर्घ्य बढ़ती है, फोटॉन की ऊर्जा पर क्या प्रभाव पड़ता है?

प्रकाश आवृत्ति और देहली (threshold) आवृत्ति ν0

हम आपतित प्रकाश को प्रकाश आवृत्ति द्वारा निर्धारित ऊर्जा वाले फोटॉनों की एक धारा के रूप में सोच सकते हैं। जब एक फोटॉन धातु की सतह से टकराता है, तो फोटॉन की ऊर्जा धातु में एक इलेक्ट्रॉन द्वारा अवशोषित कर ली जाती है। नीचे दिया गया चित्र प्रकाश आवृत्ति और उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों की गतिज ऊर्जा के बीच संबंध को दर्शाता है।
लाल प्रकाश (बाएं) की आवृत्ति इस धातु की देहली आवृत्ति (νलाल<ν0) से कम है, इसलिए कोई भी इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित नहीं होता है। हरी (मध्य) और नीली रोशनी (दाएं) में ν>ν0 है, इसलिए दोनों स्थितियों में प्रकाशिक उत्सर्जन होता है। उच्च ऊर्जा वाली नीली रोशनी हरी रोशनी की तुलना में उच्च गतिज ऊर्जा वाले इलेक्ट्रॉनों को बाहर निकालती है।
वैज्ञानिकों ने देखा कि यदि आपतित प्रकाश की आवृत्ति न्यूनतम आवृत्ति ν0 से कम थी, तो कोई भी इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित नहीं हुआ, चाहे प्रकाश का आयाम कुछ भी रहा हो। इस न्यूनतम आवृत्ति को देहली आवृत्ति (Threshold frequency) भी कहा जाता है, और ν0 का मान धातु पर निर्भर करता है। ν0 से अधिक आवृत्तियों के लिए, धातु से इलेक्ट्रॉनों का उत्सर्जन होगा। इसके अलावा, प्रकाशिक इलेक्ट्रॉनों की गतिज ऊर्जा प्रकाश आवृत्ति के समानुपाती थी। प्रकाशिक इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा और प्रकाश आवृत्ति के बीच संबंध नीचे आलेख (A) में दिखाया गया है।
चूँकि प्रकाश की आवृत्ति बढ़ने के साथ-साथ प्रकाश का आयाम स्थिर रखा गया था, धातु द्वारा अवशोषित होने वाले फोटॉनों की संख्या स्थिर रही। इस प्रकार, धातु (या विद्युत धारा) से इलेक्ट्रॉनों के निकलने की दर भी स्थिर रही। इलेक्ट्रॉन धारा और प्रकाश आवृत्ति के बीच संबंध ऊपर आलेख (B) में दर्शाया गया है।

क्या इसके अलावा और भी कोई गणित है?

हम ऊर्जा संरक्षण के नियम का उपयोग करके आवृत्ति के संबंध का विश्लेषण कर सकते हैं। आने वाले फोटॉन की कुल ऊर्जा, Eफ़ोटॉन, उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा KEइलेक्ट्रॉन , तथा धातु से इलेक्ट्रॉन को उत्सर्जित करने के लिए आवश्यक ऊर्जा के योग के बराबर होनी चाहिए। किसी विशेष धातु से इलेक्ट्रॉन को मुक्त करने के लिए आवश्यक ऊर्जा को धातु का कार्य-फलन (work function) भी कहा जाता है, जिसे प्रतीक Φ (J की इकाइयों में) द्वारा दर्शाया जाता है:
Eफ़ोटॉन=KEइलेक्ट्रॉन+Φ
देहली आवृत्ति ν0 की तरह, Φ का मान भी धातु के आधार पर बदलता है। अब हम प्लैंक के समीकरण का उपयोग करके फोटॉन की ऊर्जा को प्रकाश आवृत्ति के संदर्भ में व्यक्त कर सकते हैं:
Eफ़ोटॉन=hν=KEइलेक्ट्रॉन+Φ
इस समीकरण को इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा के संदर्भ में पुनर्व्यवस्थित करने पर, हमें प्राप्त होता है:
KEइलेक्ट्रान=hνΦ
हम देख सकते हैं कि जब तक फोटॉन की ऊर्जा कार्य-फलन Φ से अधिक होती है, प्रकाशिक इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा ν के साथ रैखिक रूप से बढ़ती है। ऊपर आलेख (A) में दिखाया गया संबंध यही है। हम इस समीकरण का उपयोग प्रकाशिक इलेक्ट्रॉन का वेग v ज्ञात करने के लिए भी कर सकते हैं, जो KEइलेक्ट्रान से निम्नानुसार संबंधित है:
KEइलेक्ट्रान=hνΦ=12mev2
जहां me एक इलेक्ट्रॉन का विराम द्रव्यमान, 9.1094×1031kg है।

तरंग आयाम प्रवृत्तियों ( wave amplitude trends) का अन्वेषण

फोटॉन के संदर्भ में, उच्च आयाम वाले प्रकाश का अर्थ है धातु की सतह पर अधिक फोटॉनों का टकराना। इसके परिणामस्वरूप एक निश्चित समयावधि में अधिक इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होते हैं। जब तक प्रकाश आवृत्ति ν0 से अधिक है, प्रकाश का आयाम बढ़ने से इलेक्ट्रॉन धारा आनुपातिक रूप से बढ़ जाएगी जैसा कि नीचे ग्राफ (A) में दिखाया गया है।
चूँकि प्रकाश का आयाम बढ़ने से आने वाले फोटॉन की ऊर्जा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, अतः प्रकाश का आयाम बढ़ने पर प्रकाशिक इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा स्थिर रहती है (ऊपर आलेख (B) देखें)।
यदि हम अपने जहाजघाट-गेंद के उदाहरण का उपयोग करके इस परिणाम को समझाने की कोशिश करते हैं, तो ग्राफ (B) में दिया गया संबंध इंगित करता है कि जहाजघाट से टकराने वाली लहर की ऊंचाई से कोई फर्क नहीं पड़ताचाहे वह छोटी लहर हो, या बड़ी सुनामी हो गेंदे समान गति से जहाजघाट से उछलेंगी! इस प्रकार, हमारा अंतर्ज्ञान और उदाहरण, दोनों इन विशिष्ट प्रयोगों को ठीक तरह नहीं समझा पते हैं।

उदाहरण 1: तांबे के लिए प्रकाश-विद्युत प्रभाव

तांबा धातु का कार्य-फलन Φ=7.53×1019 J है। यदि हम तांबे पर 3.0×1016 Hz की आवृत्ति वाला प्रकाश डालते हैं, तो क्या प्रकाश-विद्युत प्रभाव देखा जा सकता है?
इलेक्ट्रॉनों के उत्सर्जन के लिए, फोटॉनों की ऊर्जा तांबे के कार्य-फलन से अधिक होनी चाहिए। हम फोटॉन की ऊर्जा, Eफोटॉन की गणना करने के लिए प्लैंक के समीकरण का उपयोग कर सकते हैं, :
Eफ़ोटॉन=hν=(6.626×1034 Js)(3.0×1016 Hz) h तथा ν के मान को प्रतिस्थापित करने पर=2.0×1017 J
यदि हम प्राप्त फोटॉन ऊर्जा, Eफ़ोटॉन, की तुलना तांबे के कार्य फलन से करते हैं, तो हम देखते हैं कि फोटॉन ऊर्जा Φ से अधिक है:
 2.0×1017 J > 7.53×1019 J
        Eफ़ोटॉन                   Φ
इस प्रकार, हम उम्मीद कर सकते हैं कि तांबे से प्रकाशिक इलेक्ट्रॉन मुक्त होंगे। इसके बाद, हम प्रकाशिक इलेक्ट्रॉनों की गतिज ऊर्जा की गणना करेंगे।

उदाहरण 2: एक प्रकाशिक इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा की गणना

3.0×1016 Hz की आवृत्ति वाले प्रकाश द्वारा तांबे से मुक्त किए गए प्रकाशिक इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा क्या है?
हम उस समीकरण का उपयोग करके प्रकाशिक इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा की गणना कर सकते हैं जो KEइलेक्ट्रान को फोटॉन की ऊर्जा Eफ़ोटॉन, और कार्य फलन, Φ से संबंधित करता है:
Eफ़ोटॉन=KEइलेक्ट्रॉन+Φ
चूँकि हम KEइलेक्ट्रान ज्ञात करना चाहते हैं, इसलिए हम सबसे पहले समीकरण को पुनर्व्यवस्थित करते हैं ताकि हम इसे इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा के लिए हल कर सकें:
KEइलेक्ट्रॉन=Eफ़ोटॉनΦ
अब हम उदाहरण 1 से Eफ़ोटॉन और Φ के ज्ञात मान प्रतिस्थापित कर सकते हैं:
KEइलेक्ट्रान=(2.0×1017 J)(7.53×1019 J)=1.9×1017 J
इसलिए, प्रत्येक प्रकाशिक इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा 1.9×1017 J होती है।

सारांश

  • प्रकाश के तरंग मॉडल के आधार पर, भौतिकविदों ने अनुमान लगाया कि प्रकाश का आयाम (amplitude) बढ़ने से उत्सर्जित प्रकाशिक इलेक्ट्रॉनों (photoelectrons) की गतिज ऊर्जा में वृद्धि होगी, जबकि आवृत्ति बढ़ने से मापी गई धारा में वृद्धि होगी।
  • प्रयोगों से पता चला कि प्रकाश की आवृत्ति बढ़ने से प्रकाशिक इलेक्ट्रॉनों की गतिज ऊर्जा में वृद्धि हुई, और प्रकाश का आयाम बढ़ने से धारा में वृद्धि हुई।
  • इन निष्कर्षों के आधार पर, आइंस्टीन ने प्रस्तावित किया कि प्रकाश E=hν की ऊर्जा वाले फोटॉनों की एक धारा की तरह व्यवहार करता है।
  • कार्य-फलन, Φ, किसी विशिष्ट धातु की सतह से इलेक्ट्रॉनों के उत्सर्जन को प्रेरित करने के लिए आवश्यक ऊर्जा की न्यूनतम मात्रा है।
  • आपतित फोटॉन की ऊर्जा, कार्य फलन और प्रकाशिक इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा के योग के बराबर होनी चाहिए: Eफ़ोटॉन=KE इलेक्ट्रॉन+Φ

हल करने का प्रयास करें।

जब हम एक रहस्यमय धातु पर 6.20×1014Hz आवृत्ति वाला प्रकाश चमकाते हैं, तो हम देखते हैं कि उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों की गतिज ऊर्जा 3.28×1020J होती है। रहस्यमय धातु के लिए कुछ संभावित उम्मीदवार नीचे दिए गए हैं:
धातुकार्य-फलन Φ (जूल, J)
कैल्सियम, Ca4.60×1019
टिन, Sn7.08×1019
सोडियम, Na3.78×1019
हाफनियम, Hf6.25×1019
समेरियम, Sm4.33×1019
इस जानकारी के आधार पर, हमारी रहस्यमय धातु की सबसे संभावित पहचान क्या हो सकती है?
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