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मुख्य कॉन्टेंट

बोर का हाइड्रोजन मॉडल

बोर का हाइड्रोजन मॉडल परमाणु उत्सर्जन स्पेक्ट्रा की व्याख्या कैसे करता है?

मुख्य बिन्दु

  • बोर का हाइड्रोजन का मॉडल इस आधुनिक धारणा पर आधारित है कि इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर विशिष्ट कोश, या कक्षाओं में यात्रा करते हैं।
  • बोर के मॉडल ने n कोश में स्थित एक इलेक्ट्रॉन के लिए निम्नलिखित ऊर्जाओं की गणना की:
E(n)=1n213.6eV
  • बोर ने ऊर्जा के स्तर को बदलने के लिए इलेक्ट्रॉनों को अवशोषित करने और फोटॉन उत्सर्जित करने के संदर्भ में हाइड्रोजन स्पेक्ट्रम की व्याख्या की, जहां फोटॉन की ऊर्जा है:
hν=ΔE=(1nlow21nhigh2)13.6eV
  • बोर का मॉडल एक से अधिक इलेक्ट्रॉन वाले निकाय के लिए काम नहीं करता है।

परमाणु का ग्रहीय मॉडल (planetary model)

20वीं सदी की शुरुआत में, अध्ययन का एक नया क्षेत्र उभरा जिसे क्वांटम-यांत्रिकी (Quantum Mechanics) के नाम से जाना जाता है। इस क्षेत्र के संस्थापकों में से एक दानिश भौतिक विज्ञानी नील्स बोर थे, जो विभिन्न तत्वों द्वारा प्रकाश उत्सर्जित किए जाने पर देखे गए विविक्त रेखा स्पेक्ट्रम ( discrete line spectrum) को समझने में रुचि रखते थे। बोर को परमाणु की संरचना में भी रुचि थी, जो उस समय कड़ी बहस का विषय था। जे. जे. थॉमसन द्वारा इलेक्ट्रॉन की खोज और अर्नेस्ट रदरफोर्ड द्वारा नाभिक की खोज सहित कई प्रयोगात्मक परिणामों के आधार पर परमाणु के कई मॉडल प्रस्तुत किए गए थे। बोर ने ग्रहीय मॉडल का समर्थन किया, जिसमें इलेक्ट्रॉन धनात्मक रूप से आवेशित नाभिक के चारों ओर परिक्रमा करते हैं, जैसे शनि ग्रह के चारों ओर के छल्ले - या वैकल्पिक रूप से, सूर्य के चारों ओर ग्रह।
शनि ग्रह तथा उसके छल्लों का चित्र
रदरफोर्ड और बोर सहित कई वैज्ञानिकों ने सोचा कि इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर वैसे ही परिक्रमा कर सकते हैं जैसे शनि ग्रह के चारों ओर छल्ले। चित्र आभार: शनि का चित्र NASA द्वारा
किन्तु, वैज्ञानिकों के पास अभी भी कई अनुत्तरित प्रश्न थे:
  • इलेक्ट्रॉन कहाँ हैं, और वे क्या कर रहे हैं?
  • यदि इलेक्ट्रॉन नाभिक की परिक्रमा कर रहे हैं, तो चिरसम्मत भौतिकी (classical physics) की प्रागुक्ति (prediction) के अनुसार वे नाभिक में क्यों नहीं गिरते?
  • परमाणु की आंतरिक संरचना, उत्तेजित तत्वों (excited elements) द्वारा निर्मित विविक्त उत्सर्जन रेखाओं ( discrete emission lines) से किस प्रकार संबंधित है?
बोर ने इन प्रश्नों को एक सरल सी धारणा का उपयोग करके संबोधित किया: क्या होगा यदि परमाणु संरचना के कुछ पहलू, जैसे कि इलेक्ट्रॉन कक्षाएँ और ऊर्जा, केवल कुछ निश्चित मान ही ले सकें?

क्वाँटीकरण और फोटॉन

1900 के दशक की शुरुआत तक, वैज्ञानिकों को ज्ञात हो गया था कि कुछ घटनाएँ सतत (continuous) नहीं बल्कि विविक्त (discrete) तरीके से घटित होती हैं। भौतिक विज्ञानी मैक्स प्लैंक और अल्बर्ट आइंस्टीन ने हाल ही में सिद्धांत दिया था कि विद्युतचुम्बकीय विकिरण न केवल एक तरंग की तरह व्यवहार करता है, बल्कि कभी-कभी फोटॉन नामक कणों की तरह भी व्यवहार करता है। प्लैंक ने गर्म वस्तुओं द्वारा उत्सर्जित विद्युतचुम्बकीय विकिरण का अध्ययन किया, और प्रस्तावित किया कि उत्सर्जित विद्युतचुम्बकीय विकिरण "क्वाँटीकृत (quantized)" था क्योंकि प्रकाश की ऊर्जा में केवल निम्नलिखित समीकरण द्वारा दिए गए मान हो सकते हैं: Eफ़ोटॉन=nhν, जहां n एक धनात्मक पूर्णांक है, h प्लैंक का स्थिरांक है—6.626×1034Js —और ν प्रकाश की आवृत्ति है, जिसकी इकाई 1s है।
परिणामस्वरूप, उत्सर्जित विद्युत चुम्बकीय विकिरण में ऐसी ऊर्जाएँ होनी चाहिए जो hν की गुणज हों। आइंस्टीन ने प्लैंक के परिणामों का उपयोग यह समझाने के लिए किया कि प्रकाश-विद्युत प्रभाव में धातु की सतह से इलेक्ट्रॉनों को मुक्त करने के लिए प्रकाश की न्यूनतम आवृत्ति की आवश्यकता क्यों होती है।
जब किसी चीज़ को क्वाँटीकृत किया जाता है, तो इसका अर्थ है कि केवल विशिष्ट मान संभव हैं, जैसे कि हारमोनियम बजाते समय। चूँकि हारमोनियम की प्रत्येक कुंजी को एक विशिष्ट ध्वनि पर ट्यून किया जाता है, अतः केवल ध्वनियों का एक निश्चित सेट - जो ध्वनि तरंगों की आवृत्तियों के अनुरूप होता है - ही उत्पन्न किया जा सकता है।आप हारमोनियम पर 'सा' या 'कोमल रे' बजा सकते हैं, लेकिन आप 'सा' और 'कोमल रे' के बीच का आधा स्वर नहीं बजा सकते।

परमाण्वीय रेखा स्पेक्ट्रम (Atomic line spectra)

परमाण्वीय रेखा स्पेक्ट्रम क्वाँटीकरण का एक और उदाहरण है। जब किसी तत्व या आयन को आग द्वारा गर्म किया जाता है या विद्युत धारा द्वारा उत्तेजित किया जाता है, तो उत्तेजित परमाणु एक विशिष्ट रंग का प्रकाश उत्सर्जित करते हैं। उत्सर्जित प्रकाश को एक प्रिज्म द्वारा अपवर्तित किया जा सकता है, जिससे एक विशिष्ट धारीदार (striped) स्पेक्ट्रा उत्पन्न होता है जिसका कारण प्रकाश की कुछ विशिष्ट तरंगदैर्घ्यों का उत्सर्जन है।
सोडियम का उत्सर्जन स्पेक्ट्रा (ऊपर), सूर्य के उत्सर्जन स्पेक्ट्रम की तुलना में (नीचे)। सूर्य के उत्सर्जन स्पेक्ट्रम में गहरी रेखाएँ, जिन्हें फ्रौनहोफ़र रेखाएँ भी कहा जाता है, सूर्य के वायुमंडल में तत्वों द्वारा प्रकाश की विशिष्ट तरंगदैर्घ्य के अवशोषण से उत्पन्न होती हैं। इनको साथ रख कर तुलना करने से पता चलता है कि सूर्य के उत्सर्जन स्पेक्ट्रम के लगभग मध्य में गहरी रेखाओं की जोड़ी संभवतः सूर्य के वातावरण में सोडियम के कारण है। चित्र साभार: यहाँ, जैव विविधता विरासत पुस्तकालय से
हाइड्रोजन परमाणु के अपेक्षाकृत सरल मामले के लिए, कुछ उत्सर्जन रेखाओं की तरंगदैर्घ्य को गणितीय समीकरणों में भी फिट किया जा सकता है। हालाँकि, समीकरणों से यह स्पष्ट नहीं हुआ कि हाइड्रोजन परमाणु प्रकाश की उन विशेष तरंगदैर्घ्यों का उत्सर्जन क्यों करता है। बोर के हाइड्रोजन परमाणु के मॉडल से पहले, वैज्ञानिक परमाण्वीय उत्सर्जन स्पेक्ट्रा के क्वाँटीकरण के पीछे के कारण को लेकर स्पष्ट नहीं थे।

बोर का हाइड्रोजन परमाणु मॉडल: इलेक्ट्रॉनिक संरचना का क्वाँटीकरण

बोर का हाइड्रोजन परमाणु मॉडल ग्रहीय मॉडल से आरंभ हुआ, लेकिन उन्होंने इलेक्ट्रॉनों के संबंध में एक धारणा जोड़ी। यदि परमाणु की इलेक्ट्रॉनिक संरचना को क्वाँटीकृत किया जाए तो क्या होगा? बोर ने सुझाव दिया कि शायद इलेक्ट्रॉन केवल विशिष्ट कक्षाओं या एक निश्चित त्रिज्या वाले कोशों (shells) में ही नाभिक की परिक्रमा कर सकते हैं। केवल वही कोश अनुमत (allowed) होंगे जिनकी त्रिज्या नीचे दिए गए समीकरण द्वारा दी जा सकेगी, और इलेक्ट्रॉन इन कोशों के बीच नहीं रह सकता है। गणितीय रूप से, हम परमाणु त्रिज्या के अनुमत (allowed) मानों को r(n)=n2r(1) के रूप में लिख सकते हैं, जहां n एक धनात्मक पूर्णांक है, और r(1) बोर त्रिज्या है, जो हाइड्रोजन के लिए सबसे छोटी अनुमत त्रिज्या है।
उन्होंने पाया कि r(1) का मान है:
बोर त्रिज्या=r(1)=0.529×1010m
ग्रहीय मॉडल का उपयोग करके दिखाया गया लिथियम का एक परमाणु। इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर वृत्ताकार कक्षाओं में हैं। चित्र साभार: विकिमीडिया कॉमन्स से ग्रहीय परमाणु मॉडल, CC-BY-SA 3.0
इलेक्ट्रॉनों को धनावेशित नाभिक के चारों ओर वृत्ताकार, क्वाँटीकृत कक्षाओं में रखकर, बोर हाइड्रोजन के nवें ऊर्जा स्तर में एक इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा की गणना करने में सक्षम थे: E(n)=1n213.6eV, जहां हाइड्रोजन इलेक्ट्रॉन की न्यूनतम संभव ऊर्जा या निम्नतम अवस्था ऊर्जा (ground state energy)-E(1)13.6eV है।
ध्यान दें कि ऊर्जा हमेशा एक ऋणात्मक संख्या होगी, और निम्नतम अवस्था, n=1, का मान सबसे अधिक ऋणात्मक होगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि कक्षा में एक इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा उस इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा के सापेक्ष होती है जो नाभिक से पूरी तरह से अलग हो गया है, n=, जिसकी ऊर्जा 0eV होती है। चूँकि नाभिक के चारों ओर की कक्षा में स्थित एक इलेक्ट्रॉन उस इलेक्ट्रॉन की तुलना में अधिक स्थिर होता है जो नाभिक से अनंत दूरी पर है, अतः कक्षा में एक इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा हमेशा ऋणात्मक होती है।

अवशोषण एवं उत्सर्जन

बामर श्रेणी के लिए संक्रमण (transition) दर्शाने वाला ऊर्जा स्तर आरेख, जिसमें n=2 ऊर्जा स्तर, निम्नतम अवस्था है।
बामर श्रेणी—हाइड्रोजन के उत्सर्जन स्पेक्ट्रम के दृश्य क्षेत्र में स्पेक्ट्रमी रेखाएं—n=3-6 ऊर्जा स्तर से n=2 ऊर्जा स्तर तक आने वाले इलेक्ट्रॉनों के संगत हैं।
बोर अब इलेक्ट्रॉनिक संरचना के संदर्भ में अवशोषण और उत्सर्जन की प्रक्रियाओं का सटीक वर्णन कर सकते थे। बोर के मॉडल के अनुसार, एक इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा स्तर तक उत्तेजित होने के लिए फोटॉन के रूप में ऊर्जा को अवशोषित करेगा जब तक कि फोटॉन की ऊर्जा, प्रारंभिक और अंतिम ऊर्जा स्तरों की ऊर्जा के बीच के अंतर के बराबर हो। उच्च ऊर्जा स्तर — जिसे उत्तेजित अवस्था भी कहा जाता है, पर कूदने के बाद — उत्तेजित इलेक्ट्रॉन कम स्थिर स्थिति में होगा, इसलिए यह निचले, अधिक स्थिर ऊर्जा स्तर पर वापस आने के लिए एक फोटॉन उत्सर्जित कर देगा।
ऊर्जा स्तर और उनके बीच संक्रमण (transition) को ऊर्जा स्तर आरेख का उपयोग करके चित्रित किया जा सकता है, जैसे कि ऊपर दिए गए उदाहरण में इलेक्ट्रॉनों को हाइड्रोजन के n=2 स्तर पर वापस आते हुए दिखाया गया है। उत्सर्जित फोटॉन की ऊर्जा, एक विशेष संक्रमण के लिए दो ऊर्जा स्तरों के बीच की ऊर्जा के अंतर के बराबर होती है। ऊर्जा स्तर nउच्च और nनिम्न के बीच की ऊर्जा के अंतर की गणना पिछले अनुभाग में उल्लेखित E(n) के समीकरण का उपयोग करके की जा सकती है:
ΔE=E(nउच्च)E(nनिम्न)=(1nउच्च213.6eV)(1nनिम्न213.6eV)=(1nनिम्न21nउच्च2)13.6eV
चूँकि हम प्लैंक के समीकरण से एक फोटॉन की ऊर्जा और उसकी आवृत्ति के बीच संबंध को जानते हैं, हम उत्सर्जित फोटॉन की आवृत्ति की गणना कर सकते हैं:
hν=ΔE=(1nlow21nhigh2)13.6eV            फोटॉन की ऊर्जा को ऊर्जा के अंतर के बराबर करेंν=(1nlow21nhigh2)13.6eVh                      आवृत्ति के लिए हल करें
हम प्रकाश की गति c, आवृत्ति ν, और तरंगदैर्घ्य λ के बीच संबंध का उपयोग करके उत्सर्जित विद्युतचुम्बकीय विकिरण की तरंगदैर्घ्य के लिए समीकरण भी ज्ञात कर सकते हैं:
c=λν                                                                  ν के लिए हल करने के लिए पुनर्व्यवस्थित करें cλ=ν=(1nनिम्न21nउच्च2)13.6eVh              1λ के लिए हल करने के लिए दोनों पक्षों को c से विभाजित करें 1λ=(1nनिम्न21nउच्च2)13.6eVhc
इस प्रकार, हम देख सकते हैं कि उत्सर्जित फोटॉन की आवृत्ति — और तरंगदैर्घ्य — हाइड्रोजन में एक इलेक्ट्रॉन के प्रारंभिक और अंतिम कोश की ऊर्जा पर निर्भर करती है।

बोर द्वारा हाइड्रोजन मॉडल प्रस्तावित कर जाने के बाद से हमने क्या सीखा है?

बोर मॉडल, हाइड्रोजन परमाणु और अन्य एकल इलेक्ट्रॉन प्रणालियों जैसे He+ को खूबसूरती से समझा सकता था। किन्तु, जब इसे अधिक जटिल परमाणुओं के स्पेक्ट्रम पर लागू किया गया तो दुर्भाग्य से इसने उतना अच्छा प्रदर्शन नहीं किया। इसके अलावा, बोर मॉडल के पास यह समझाने का कोई तरीका नहीं था कि क्यों कुछ रेखाएं दूसरों की तुलना में अधिक तीव्र होती हैं या क्यों कुछ स्पेक्ट्रमी रेखाएं चुंबकीय क्षेत्र की उपस्थिति में कई रेखाओं में विभाजित हो जाती हैं (ज़ीमैन प्रभाव)।
आने वाले दशकों में, इरविन श्रोडिंगर जैसे वैज्ञानिकों के शोधों से ज्ञात हुआ कि ऐसा सोचा जा सकता है कि इलेक्ट्रॉन तरंगों तथा कणों, दोनों की तरह व्यवहार करते हैं। इसका अर्थ यह है कि अंतरिक्ष में किसी दिए गए इलेक्ट्रॉन की स्थिति और उसके वेग दोनों को एक ही समय में जानना संभव नहीं है। इस अवधारणा को हाइजेनबर्ग के अनिश्चितता सिद्धांत में अधिक सटीक रूप से बताया गया है। अनिश्चितता सिद्धांत बोर के इस विचार का खंडन करता है कि इलेक्ट्रॉन कुछ विशिष्ट कक्षाओं में होते हैं तथा उनका वेग और त्रिज्या ज्ञात होती है। वास्तव में, हम नाभिक के चारों ओर अंतरिक्ष के एक विशेष क्षेत्र में इलेक्ट्रॉनों को खोजने की संभावना मात्र की गणना कर सकते हैं।
आधुनिक क्वांटम-यांत्रिकीय मॉडल बोर मॉडल से एक लंबी छलांग की तरह लग सकता है, लेकिन यहाँ मुख्य विचार एक ही है: चिरसम्मत भौतिकी परमाणु स्तर पर सभी घटनाओं को समझाने के लिए पर्याप्त नहीं है। बोर, हाइड्रोजन परमाणु की इलेक्ट्रॉनिक संरचना में क्वाँटीकरण के विचार को शामिल करके इसे पहचानने वाले पहले व्यक्ति थे, और वह हाइड्रोजन के साथ-साथ अन्य एकल-इलेक्ट्रॉन प्रणालियों के उत्सर्जन स्पेक्ट्रम को समझाने में सफल रहे थे।

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